Wednesday, May 15, 2013


समानांतर सिनेमा आंदोलन : एक नयी परंपरा की खोज

मानवेन्द्र सिंह


सिनेमा हमारे समाज और उसके पीछे छिपे हुए नग्न यथार्थ को समझने का 21वीं सदी का सबसे लोकप्रिय माध्यम है। यहाँ यह फ़र्क करना जरुरी हो जाता है कि सिनेमा यथार्थ को किस स्तर तक प्रस्तुत करने में सफल हो पाता है? हमारे यहाँ सिनेमा हमेशा से दो भिन्न प्रवृत्तियों के साथ विकसित होता रहा है- मुख्यधारा सिनेमा और नया सिनेमा (जिसे सार्थक सिनेमा या गैर व्यावसायिक सिनेमा भी कहा जा सकता है)। मुख्यधारा सिनेमा आर्थिक महत्व के बरक्स दर्शक को सिर्फ अपने हितों को साधने का माध्यम बनाता है। एक तरीके से कहा जाये तो वह दर्शक को हिप्नोटाइज करता है, जबकि सार्थक सिनेमा दर्शक को अपने भीतर उतरने देता है। जिन्हें सत्यजीत राय कृत ‘गणशत्रु’ का अंतिम दृश्य याद हो, वे बखूबी इस बात को समझ सकते हैं कि कैसे कोई फ़िल्म हमारी रोज़मर्रा की विसंगतियों को वैचारिक धरातल प्रदान करती है। फ़िल्म का अंतिम दृश्य है, जिसमें कैमरा हमें डॉक्टर की मेज पर स्टैथोस्कोप के साथ मंदिर के चरणामृत की शीशी दिखाता है, उसमें तुलसी का पत्ता पड़ा है। दोनों चीजें राय ने दर्शक के सामने रख दी हैं कि विज्ञान और अंधविश्वास में से आपको एक चुनना है। यहाँ आप निर्णायक हैं। फैसला आपको करना है।

                    इस छोटे से उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि समर्थ फ़िल्मकार वही है जो, दर्शक के समक्ष प्रश्न करने वाले, परेशान करने वाले, जद्दोज़हद करने वाले सिनेमा को परदे पर साकार करता है और दर्शक को एक वैचारिक धरातल पर लाकर खड़ा कर देता है। सिनेमा के ऐतिहासिक दौर को देखा जाये, तो स्पष्ट रूप से पता चलता है कि इस प्रकार का ‘वैचारिक सिनेमा’ अथवा ‘सार्थक सिनेमा’ न केवल हिंदी में अपितु अनेक भारतीय भाषाओं में बन रहा था। इसलिए इसे हिंदी सिनेमा न कहकर हिन्दुस्तानी सिनेमा कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा। भारत में इस तरह के ‘नए सिनेमा’ की शुरुआत के सूत्र इटली के नवयथार्थवाद के अंत और फ्रेंच न्यू वेब के प्रारंभ से कमोबेश जुड़े हुए हैं। साहित्य और सिनेमा के इतिहास में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलता है। 1940 और 1950 के दशक में इटली के बड़े फ़िल्मकारों में विक्टोरियो डे सिका, फेलिनी, अंतोनियो, पासोलिनी और रोसेलिनी प्रमुख थे। ये फ़िल्मकार फ़िल्म की विषयवस्तु को नवयथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करने के हिमायती थे। इनमें रोसेलिनी से नवयथार्थवादी सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है। रोसेलिनी की फ़िल्म ‘ओपन सिटी’ (1945) में पहली बार पेशेवर कलाकारों की छोड़कर गैर व्यावसायिक कलाकारों को मौका मिला। डे सिका की ‘बाइसिकल थीव्ज’ (1948) ने मानवीय सच्चाई और विडम्बना को पर्त-दर-पर्त मार्मिक अभिव्यक्ति के साथ मौलिक रूप से प्रस्तुत किया।

                   दूसरे विश्वयुद्ध और फासीवाद के बाद इटली में रिनेसां की शुरुआत होती है, जिसे विश्व सिनेमा के सन्दर्भ में ‘न्यू वेब’ आन्दोलन कहा जाता है। इस आन्दोलन के अग्रदूत आंद्रे बाजां ने सिनेमा को वैचारिक स्तर पर देखने, सुनने और समझने की ओर फ़िल्म सिद्धांतकारों का ध्यान आकर्षित किया। बाजां ने 1943 में सिनेमा पर स्वतन्त्र रूप से लिखना आरंभ किया। वे फ्रेंच मैगज़ीन ‘Cahiers du Cinema’ (संपादक- स्टीफन डेलोर्मे) के सह-संस्थापक (1951) थे। उनके साथ डोनियल वाल्क्रोज़ और जोसेफ़ मैरी लो ड्युका भी पत्रिका से जुड़े हुए थे। मैगज़ीन के कुल चार अंक (1958-1962) निकले। बाजां ने अपने लेखों में सिनेमा के सौंदर्यशास्त्र के लिए ‘वस्तुगत यथार्थ’ (इटालियन नवयथार्थवाद), डीप फोकस तकनीक (आर्सन वेल्स), वाइड शॉट्स टेक्निक (जीन रेनिओर), शॉट इन डेफ्थ इत्यादि तकनीक के प्रयोग पर जोर दिया। उन्होंने सिनेमा में यथार्थ की निरंतरता के लिए ‘मिज़े इन सीन’ (यह एक विजुअल थीम है, जिसमें निर्देशक- कैमरा, लाइट्स, सेट्स, ध्वनि, कास्ट्यूम और कलाकार के अभिनय इत्यादि का संपादन के साथ-साथ ऐसा समायोजन करता है, जिससे दृश्य बिना किसी नाटकीयता के यथार्थपूर्ण और कलात्मक लगे। इसमें टाइम और स्पेस का महत्व होता है, साथ ही यह कलाकार के स्टेट ऑफ माइंड पर भी निर्भर करता है) के प्रयोग पर भी जोर दिया। बाजां ने फ़िल्म संपादन की तकनीक मोंताज (इसमें छोटे-छोटे शॉट्स की एक सिक्वेंस होती है, जिसे संपादन के माध्यम से इस प्रकार समायोजित किया जाता है, जिससे पर्दे पर दृश्य बिना किसी नाटकीयता के एकदम तनावपूर्ण लगे और दर्शक पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ जाये। इसमें स्पेस, टाइम और इन्फार्मेशन का विशेष ध्यान रखना होता है) के प्रभाव को भी व्याख्यायित किया। बाजां के साथ जुड़े फिल्मकारों ने फ़िल्म निर्माण से पहले उसके सैद्धांतिक पक्ष का अध्ययन किया और उसके रूप-विधान को समझा। इस प्रकार साठ के दशक में बाजां के साथ बौद्धिक सिनेमाई परिपक्वता वाले फिल्मकारों का एक समूह सामने आया, जिन्होंने 1959 से पूरी लम्बाई की फिल्मों का निर्माण शुरू किया। इसमें फ्रैंकोइस त्रुफो, क्लॉड शैबरोल, एरिक रोह्मर, जॉक रिवेट तथा ज्यां लुक गोदार प्रमुख हैं। विश्व सिनेमा के इतिहास में 1959 का समय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी साल फ्रैंकोइस त्रुफो की ‘The 400 Blows’ का कॉन फ़िल्म महोत्सव में फ़्रांस की प्रतिनिधि फ़िल्म के रूप में चयन किया गया। बाजां समूह के लिए यह एक महत्वपूर्ण घटना थी।

                   आंद्रे बाजां ने यथार्थवाद को फ़िल्म आलोचना का आधार माना। बाजां सैद्धांतिक स्तर पर स्वीकार करते हैं कि फ़िल्म उन बिम्बों को सेल्यूलाइड पर रचने में समर्थ होती है, जो संसार की सम्पूर्णता तथा सम्पन्नता के लिए स्थानिक महत्व रखते हैं। इस प्रकार युद्धोतर यूरोप की फ़िल्म संस्कृति तथा फ्रेंच ‘न्यू वेब’ पर बाजां के प्रभाव को आसानी से देखा जा सकता है। छठवें दशक के मध्य में नवयथार्थवादी आन्दोलन लगभग समाप्त हो जाता है और ‘न्यू वेब’ आन्दोलन पूरे  विश्व में कमोबेश एक साथ शुरू होता है। जर्मनी में यह ‘युवा सिनेमा’, फ़्रांस में ‘न्यू वेब’ (नई लहर), अमेरिका और इंग्लॅण्ड में यह ‘भूमिगत सिनेमा’ आदि संज्ञाओं से अभिहित किया गया। फ्रेंच की सिने-पत्रिका ‘Cahiers du Cinema’ ने इस आन्दोलन को आरम्भ करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। सिने-इतिहास में यह पहला अवसर था, जब समान दृष्टि वाले सिनेमादां एक नए ढंग के सिनेमा के निर्माण के लिए एक साथ खड़े हुए।

                   न्यू वेब का सैद्धांतिक आधार था- विद्रोह, पूर्ववर्ती सिनेमा के प्रति विद्रोह, उसकी तमाम स्थापनाओं और व्यवस्था के प्रति विद्रोह। इन नए फिल्मकारों का मुख्य विद्रोह पारंपरिक सिनेमा की निर्माण प्रक्रिया से था। ये फिल्मकार सिनेमा में रूप और वस्तु (Farm and Content) के प्रति सचेत थे, ताकि सिनेमा में वे बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात कह सकें  ‘न्यू वेब’ से जुड़े इन कलाकारों ने नामी और महंगे सितारे, निर्देशक, कैमरामैन, लंबे-चौड़े स्टूडियोज, भव्य साज-सज्जा, लाखों का बजट तथा सैकड़ों तकनीशियन-कर्मचारियों आदि का फिल्म निर्माण प्रक्रिया से बहिष्कार किया। इन्होंने छोटे बजट की फिल्में बनाई तथा स्टूडियो के दायरे से बाहर निकलकर आम कलाकारों के साथ उन्होंने वास्तविक स्थानों पर फिल्मों की शुटिंग की। शायद इसी कारण ‘न्यू वेब’ को व्यक्ति का सिनेमा कहा जाता है क्योंकि इन फिल्मों में निर्देशक का अपना नजरिया निहित है। भले ही ‘न्यू वेब’ रूप और वस्तु की दृष्टि से जैसा भी रहा हो, परंतु उसमें फिल्मकार का हस्ताक्षर बड़ी ही साफगोई से देखा जा सकता है।

                   फ्रेंच ‘न्यू वेब’ की तरह ही भारतीय सिनेमा में भी ‘नया सिनेमा’ की लहर एक कलात्मक भावबोध लेकर उपस्थित हुआ। 1950 के दशक में इटली के नवयथार्थवाद से प्रेरित सत्यजित राय- ‘पथेर पांचाली’ (1952), ऋत्विक घटक- ‘नागरिक’ (1952) और मृणाल सेन- ‘रातिभोर’ (1955) ने मानवीय मूल्यों को केंद्र में रखकर मौलिक और यथार्थवादी फिल्मों का निर्माण किया। नवयथार्थवाद फ़िल्म को जीवन के पास लाने का आंदोलन था, जिसने विषय और तकनीक दोनों में बदवाल किया। पचास के दशक में ही साहित्य में भी, खासतैर पर हिंदी में 'नई कहानी' और 'नई कविता' आंदोलन की शुरूआत हुई। भारतीय सिनेमा में ‘न्यू वेब’ को ‘नया सिनेमा’, ‘समानांतर सिनेमा’, ‘कला सिनेमा’, ‘सार्थक सिनेमा’ और ‘गैर व्यावसायिक सिनेमा’ इत्यादि नामों से जाना जाता रहा है। भारत में पचास और साठ का दशक साहित्य और सिनेमा में हो रहे परिवर्तनों को एक नए सिरे से जांचने-परखने की मांग करता है और निश्चित तौर पर इसे विश्लेषित किया भी जाना चाहिए।   
        
                   मई 1964 को जवाहर लाल नेहरु के अवसान के बाद भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में कई अनपेक्षित मोड़ आये। लाल बहादुर शास्त्री भारत के नए प्रधानमंत्री बने। इंदिरा गाँधी उनके मंत्रिमण्डल में सूचना और प्रसारणमंत्री (1964-1966) बनीं। लाल बहादुर शास्त्री देश को गाँधीवादी आदर्शों पर ले जाने का सपना देख रहे थे, उससे पहले ही दिसंबर 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया और जनवरी 1966 में शास्त्री जी का ताशकंद में निधन हो गया। तत्पश्चात इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं। 1966, 1967 और 1968 में पूरे देश में भयंकर सूखा और अकाल पड़ा। 1967 में ही बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन शुरू हुआ। यह आंदोलन पढ़े-लिखे युवाओं में खासतौर से कलकत्ता के आस-पास फैला। वास्तव में नेहरु युग के बाद की राजनीति को मोहभंग की राजनीति के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। सत्ता-प्रतिष्ठान लूट-खसोट और भ्रष्टाचार के पर्याय के रूप प्रचलित हो गए थे।

                   1965 के बाद भारत की राजनीति में प्रतिरोध का स्वर प्रबल हुआ। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, किन्तु अनेक राज्यों में संविद (संयुक्त विधायक दल) सरकारों की स्थापना हुई, जो कि विरोधी दलों के सम्मिलन का परिणाम था। सत्ताधारी दल कांग्रेस का विघटन होने लगा। इस सबकी परिणति 1974 में पूरे देश में आपातकाल की घोषणा के रूप में हुई। इस अवधि में घटित परिस्थितियों को जनमानस ने गहराई से महसूस किया। दमन, शोषण, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता और हिंसा के अलग-अलग रूप सामने आये। नया सिनेमा में भी भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का स्वर स्पष्ट है। कहना न होगा कि यह वह समय था, जब भारतीय समाज में अनेक तरह के सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक विमर्श की एक मुकम्मल जमीन तैयार हो रही थी। इसी कालखंड में उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में सवर्ण व पिछड़ी जातियों के संघर्षों की धार पैनी हुई। गांवों में सामंती व्यवस्था का शोषण अपने चरम पर था। सरकार ने न्यूनतम मजदूरी कानून लागू किया, सामंतों ने इसका हल अपने तरीके से ढूंढ लिया था। गांव में भूमिहीन मजदूर महानगरों में आकर विस्थापन (पार-गौतम घोष) के दंश सहने के लिए मजबूर थे। भारतीय नया सिनेमा को समझने के लिए इन परंपरागत पहलुओं को समझना जरुरी था, जिसने नया सिनेमा के फिल्मकारों के लिए व्यापक जमीन मुहैया कराई।

                    सिनेमा से जुड़े संस्थानों-एजेंसियों का जिक्र भी थोड़ा संक्षेप में ही सही लाज़मी हो जाता है कि किस प्रकार इस आंदोलन के सूत्रपात में इनका योगदान महत्वपूर्ण था। स्वतंत्र भारत के पहले दशक में सिनेमा से संबंधित गतिविधियों में इज़ाफा हुआ। 1940 में भारतीय एवं ब्रिटिश फिल्मकारों के लिए ‘फ़िल्म ऐडवाइजरी बोर्ड’ का गठन हो चुका था, जिसका नया नाम 1943 में ‘इन्फोर्मेशन फिल्म्स ऑफ इंडिया’ कर दिया गया। इसका एक खास प्रयोजन था- दूसरे विश्वयुद्ध के प्रभाव से संबद्ध लघु फिल्मों एवं प्रॉपगैंडा फिल्मों का निर्माण। 1948-1949 में ‘फिल्म्स डिवीजन’ का गठन हुआ। साथ ही भारत सरकार ने सिनेमा के क्षेत्र में विश्व पटल पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने हेतु 1952 में पहले ‘अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह’ का आयोजन किया। 1960 सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन ‘फ़िल्म वित्त निगम’ (Film Finance Corporation) की स्थापना हुई। सरकार ने FFC के लिए 50 लाख रूपये की मुलभूत पूंजी तथा एक करोड़ रूपये की सरकारी गारंटी की व्यवस्था की। इसका उद्देश्य नए फिल्मकारों को सार्थक सिनेमा बनाने के लिए ऋण मुहैया कराना था। ‘फ़िल्म फेयर’ जैसी पत्रिकाओं ने व्यावसायिक निर्माताओं के समर्थन में FFC के इस सराहनीय कदम की आलोचना की। 1960 में ही ‘फ़िल्म और टेलीविजन संस्थान’ की दिल्ली में स्थापना (जिसे 1974 में दिल्ली से पूना शिफ्ट कर दिया गया) हुई।

                   फ़िल्म इंस्टीट्यूट से निर्देशन और तकनीक में प्रशिक्षण प्राप्त फिल्मकारों ने फिल्मों में प्लाट के तौर पर आधुनिक भारतीय साहित्य की रचनाओं को आधार बनाया। नया सिनेमा के इन फिल्मकारों को ‘न्यू वेब’ की सिने-भाषा, शैली-शिल्प और अनुप्रयोगों की गंभीर जानकारी थी। इनकी फिल्मों में साहित्य के सिनेमाई-रूपांतरण का उद्देश्य रचना (Text) के कथ्य को एक माध्यम से दूसरे माध्यम में रूपांतरित करना था। साहित्य में पहले जो कहानी शब्दों के माध्यम से कही जाती थी, उन्हीं शब्दों को सिनेमाई तकनीक के माध्यम से दृश्य-बिम्बों में पर्दे पर उकेरा गया। नये सिनेमा के सन्दर्भ में एक बात हमेशा मन में सवाल खड़े करती है कि इसका चरित्र शुरू से ही प्रतिरोध का रहा है, चाहे वह सरकारी-तंत्र हो, न्याय-प्रणाली हो, मीडिया हो या सामंतशाही-व्यवस्था हो, नया सिनेमा व्यंगात्मक उपादानों के सहारे सबकी आलोचना का पक्षधर रहा है। फिर यह आंदोलन सरकार के पैसे से ही क्योंकर शुरू हुआ? ‘The New Indian Cinema’ में अरुणा वासुदेव ने भी स्वीकार किया है कि भारत में समानांतर सिनेमा की शुरुआत लोकप्रिय सिनेमा के विरुद्ध फ़िल्म निर्माताओं के प्रोत्साहन से पैदा न होकर सरकारी निर्णय से उत्पन्न हुआ। आखिर ऐसा क्यों हुआ, यह शोध का विषय हो सकता है।

             समानांतर सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंधों के दृष्टिकोण से सन् 1969 को प्रस्थान बिंदु माना जा सकता है। 1969 में आई तीन फिल्मों- मृणाल सेन की ‘भुवनशोम’ (बनफूल के उपन्यास पर आधारित), बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ (राजेंद्र यादव के उपन्यास पर आधारित) और मणिकौल की ‘उसकी रोटी’ (मोहन राकेश की कहानी पर आधारित) से समानांतर सिनेमा की शुरूआत मानी जाती है। इन फिल्मों के आधार पर समानांतर सिनेमा को तीन धाराओंराजनैतिक समानांतर सिनेमा (भुवनशोम), मध्यवर्ग का सिनेमा (सारा आकाश) और प्रयोगवादी सिनेमा (उसकी रोटी) में विभाजित किया जा सकता है। यह एक महत्त्वपूर्ण संयोग है कि फ्रैंच ‘न्यू वेब’ की तरह भारतीय ‘समानांतर सिनेमा’ का स्वर विद्रोही नहीं है और न ही उसने व्यावसायिक फिल्मों के विरूद्ध कोई सख्त रवैया अपनाया। अपितु समानांतर सिनेमा ने व्यावसायिक सिनेमा के बरक्स मध्यवर्ग का एक नए तरह का सिनेमा विकसित किया, जिसका प्रभाव लोकप्रिय सिनेमा के संदर्भ में आसानी से देखा जा सकता है।

             मृणाल सेन ने 1968 में ‘भुवनशोम’ के निर्माण के लिए ‘फ़िल्म वित्त निगम’ के पास ऋण के लिए आवेदन किया और उन्हें स्वीकृति मिल गयी। ‘भुवनशोम’ 1969 में पर्दे पर आई, जो कि उनकी पहली फिल्मों से अलहदा थी, एकदम नए कलेवर के साथ। आधुनिक भारतीय सिनेमा के लिए यह फ़िल्म एक क्रांतिकारी प्रस्थान बिंदु थी। इसके पहले मृणाल सेन बांग्ला में सात फ़िल्में ‘रातभोर’ (1955), ‘नील आकाशेर नीचे’ (1958), ‘बाइसे श्रवण’ (1960), ‘पुनश्च’ (1961), ‘अवशेषे’ (1963), ‘प्रतिनिधि’ (1964), ‘आकाश कुसुम’ (1965) और उड़िया में ‘माटिर मनीष’ (1966) बना चुके थे। ‘भुवनशोम’ के फिल्मांकन से पूर्व मृणाल सेन विद्द्यार्थी जीवन में ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ और ‘इंडियन पीपुल्स थियेटर एशोसिएशन’ (IPTA) से जुड़े रहे। फ़िल्म में उनकी अभिरुचि रुडोल्फ आर्नहाइम की पुस्तक ‘Film Aesthetics’ और आइजेन्सटाइन के शागिर्द ब्लादिमिर निल्सन की ‘The Cinema as a Graphic Art’ के अध्ययन से हुई। 1945 में सिनेमा पर उनका पहला लेख ‘Cinema and the People सोवियत जर्नल में प्रकाशित हुआ, जिसके संपादक हीरेन मुखर्जी थे। फ़िल्में बनाने से पहले सेन बतौर ऑडियो टेक्नीशियन ‘कलकत्ता फ़िल्म स्टूडियो’ में काम कर चुके थे।

               ‘भुवनशोम’ मृणाल सेन की पहली ऐसी फ़िल्म थी, जिसका फिल्मांकन उन्होंने हिंदी में किया। इसकी पटकथा मृणाल सेन ने, संवाद- बद्रीनाथ और सत्येन्द्र शर्मा ने लिखा। संगीत विजय राघव राव, कैमरा संचालन के.के. महाजन और संपादन राजू नायक ने किया। फ़िल्म की लोकेशन गुजरात की है और इसकी लम्बाई 96 मिनट है। ‘भुवनशोम’ 50 साल के एक ऐसे विधुर आदमी की कहानी है, जो रेलवे में अफ़सर है। सैद्धांतिक स्तर पर अपने मातहतों में उसकी छवि सख्त नियम-कायदे वाले अनुशासन प्रिय व तुनक मिजाज़ अफ़सर की है। फ़िल्म की शुरुआत संगीत की ध्वनि से होती है-

Scene no. 1/Ext./ Mid shot/रेल की पटरियाँ/ रेल की तेज गति व ध्वनि
Scene no. 2/ Int./ Mid shot/रेलवे का एक छोटा सा प्लेटफार्म
प्लेटफार्म पर टी.टी. जाधव पटेल (साधू मेहर) दाढ़ी बनवा रहा है। तभी उसका दूसरा साथी आता है... (Mid shot)
दूसरा साथी- अरे जाधव भाई...! क्या सचमुच बड़े साहब आ रहे हैं?...
जाधव पटेल- आ रहे हैं मतलब?.... अरे आये ही समझो, ट्रेन आने में कितनी देर है, देखो आते ही क्या हंगामा करता है?... अच्छा सुनो...! तुम्हारा कोई गोलमाल या लफड़ा तो नहीं?...
दूसरा साथी- इसका मतलब?.... (गुस्से में)
जाधव पटेल- मतलब यही कि तुम तो अच्छी तरह जानते हो... साला शोम साहब एक नंबर... खैर छोड़ो... आओ चाय पीएं...
Scene no. 3/Ext./ Mid shot/रेल की पटरियाँ/ रेल की तेज गति व ध्वनि
Scene no. 4/Ext./ Mid shot/चाय की दुकान/ रेल की तेज गति व ध्वनि
(जाधव और उसका साथी चाय पी रहे हैं)
जाधव पटेल- अच्छा तुम्ही बताओ...! आखिर मैंने क्या किया और जो कुछ थोड़ा बहुत किया, वो तो सिर्फ अकेले के लिए नहीं... और क्या कोई नहीं करता?... तो सिर्फ सारा दोष मेरा क्यूँ? रिपोर्ट सिर्फ मेरे ही नाम पर क्यूँ?...
दूसरा साथी- देखो वो यहाँ आ रहे हैं, हाथ पैर जोड़ दो, शायद वो माफ़ कर दें...
जाधव पटेल- दिमाग खराब है? शोम साहब और माफ़ कर दें... कोई फायदा नहीं उनके सामने गिड़गिड़ाने का... लेकिन मैं सोचता हूँ... दो महीने के बाद मेरा गौना है... अगर रिपोर्ट-विपोर्ट हो गयी तो?...
Close shot/जाधव पटेल
Scene no. 5/Ext./ Mid shot/रेल की पटरियाँ/ रेल की तेज गति व ध्वनि
(प्लेटफॉर्म पर ट्रेन रूकती है)
Scene no. 6/Int./ Mid shot/जाधव पटेल दूर से शोम साहब की बातचीत सुनता है

शोम साहब- तुम्हें बार-बार कह चुका हूँ, ये जी-हुजूरी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं, चापलूसी से आप लोग मुझे खुश नहीं कर पाएंगे, मैं पुराने ढंग का आदमी हूँ... Duty First Self Last’  यही मेरा मोटो है... अच्छी तरह ड्यूटी कीजिये मैं खुश रहूँगा और अगर काम से जी चुराया या कोई गड़ड़ की तो समझ लीजिए कि आप लोगों की खैर नहीं... झुक-झुक कर वो सलामियाँ दागने से कोई फायदा न होगा... यहाँ वो टिकेट कलक्टर था जाधव पटेल...
दूसरा कर्मचारी- ए जाधव भाई... (आवाज लगाता है)  
Scene no. 7/Int./ Mid shot/शोम साहब चुस्त-दुरुस्त सूट और टाई में/ मुँह में सिगार
Close shot/धुएँ का उठना
शोम साहब- (अंतर्मन से आवाज आती है) कैसा भीगी बिल्ली की तरह झुका हुआ है... पैसे बनाने के तरीके खूब जानता है... घूस लेने में उस्ताद... घबराओ मत बच्चू... तुम्हारी रिपोर्ट तैयार हो गयी है...
Scene no. 8/Int./ Mid shot/शोम साहब तांगे पर बैठते हैं और तांगा चल देता है
जाधव पटेल- (अंतर्मन से आवाज आती है) किस तरह घूर-घूर कर देख रहा है...!

               फ़िल्म में ये सारे दृश्य एक केस स्टडी के तौर पर देखे जा सकते हैं कि किस तरह सरकारी विभाग का एक कर्मचारी भ्रष्टाचार को एक छोटी-मोटी गलती मानता है और उसे अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है। फ़िल्म के प्रारंभिक दृश्यों से उसकी आंतरिक बुनावट को बखूबी समझा सकता है। ‘भुवनशोम’ में आज़ादी के तुरंत बाद चालीस के दशक का सेट है। फ़िल्म में शोम साहब के माध्यम से फ़िल्मकार ने कलकत्ता के मध्यवर्गीय भद्रलोक द्वारा अंग्रेजों से उधार ली गयी विक्टोरियन आदतों का तीखे व्यंग से मखौल उड़ाया है। मृणाल सेन सिनेमा में टेक्स्ट, टाइम और सिनेमैटिक फॉर्म के संयोजन को महत्व देते हैं। उनके लिए यह विधा एक टेक्नोलाजिकल परफॉरमेंस है। ‘भुवनशोम’ थीम से कहीं अधिक अपने तकनीकी पक्ष के लिए महत्वपूर्ण है। एक महान फ़िल्म के लिए जो भी घटक जरूरी होते हैं, मसलन अभिनय, छायांकन, संपादन, और बैक ग्राउंड स्कोर इत्यादि, उन सारे मानदंडों पर ‘भुवनशोम’ मील का पत्थर साबित हुई। सत्यजित राय ने ‘भुवनशोम’ के बारे में महज सात शब्दों- big, bad bureaucrat, rimford by rustic Bailey में टिप्पणी की है।

               ‘उसकी रोटी’ एक फ़िल्मकार द्वारा स्त्री मन के अंतर्गुम्फन की सेल्युलाइड पर रची गयी मौन अभिव्यंजना है। मणिकौल नया सिनेमा के उन महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी पहली फ़िल्म से ही सिनेमाई-अनुप्रयोगों के नयेपन की पहचान करायी। ‘उसकी रोटी’ की पटकथा मणिकौल, संवाद मोहन राकेश, छायांकन के.के. महाजन, संगीत रतन लाल (संतूर) ने दिया। फ़िल्म की लम्बाई 110 मिनट और लोकेशन पंजाब के एक गांव (नकोदर) का है। फ़िल्म की थीम बस ड्राइवर सुच्चा सिंह (गुरदीप सिंह) और उसकी पत्नी बालो (गरिमा) की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर आधारित है। बालो प्रतिदिन रोटियां लेकर खेतों के रास्ते लंबी दूरी तय करके नकोदर गांव के बस स्टैंड पर अपने पति का अंतहीन इंतज़ार करती रहती है। उसका पति शहर में अपनी स्वतन्त्र ज़िंदगी जीते हुए कार्ड्स खेलता है और बाकि समय अपनी रखैल के साथ गुजारता है। सप्ताह में केवल एक दिन वह अपने घर आता है। सुच्चा सिंह के लिए बालो महज एक पत्नी है, जिसके लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी हो जाना भर काफी है। इसी क्रम में एक दिन बालो रोटी ले आने में विलम्ब कर देती है और सुच्चा सिंह नाराज होकर चला जाता है। बालो उसके आने का इंतज़ार करती है, सांझ होती है और अंततः रात हो जाती है।

               मणिकौल ने 1966 में फ़िल्म स्कूल से निर्देशन में स्नातक किया। वे सिनेमा के लिए तकनीक, फॉर्म और नैरेटिव को महत्वपूर्ण मानते हैं। ‘उसकी रोटी’ में उन्होंने गैर व्यावसायिक कलाकारों को चुना। फ़िल्म में संवादों की जगह देह-भाषा, चेहरे के हाव-भाव और स्थानीयता ने ही संवाद की भाषा अख्तियार कर लिया है। फ़िल्म में जहाँ संवाद हैं भी वहां बिना किसी नाटकीयता के सहज-लो टोन में गांव के अक्खड़पन व ठेठ देहाती लहजे के साथ आया है। के.के. महाजन का कैमरा महिला किरदारों के धूसर चेहरे, हाथ के एक्सप्रेशन, मिट्टी की दीवारें, अमरूद के बाग, सड़क पर उड़ाती हुई बस, खेतों के लंबे शाट्स इत्यादि का छायांकन, पर्दे पर ऐसा सिनेरियो रचते हैं, जिसमें गंभीर नीरवता है। फ़िल्म के ये दृश्य किसी महान चित्रकार की क्लासिक कृति से प्रतीत होते हैं। ‘उसकी रोटी’ में पंजाब का वह गांव हमारे सामने एक किरदार के शक्ल में ही हमारे सामने आता है, जहाँ एकरसता के सिवाय कुछ भी नहीं है और यही बालो की ज़िंदगी का भी सच है। उसमें ज़िंदगी जीने की उद्दाम लालसा के बजाय एकरस व सपाट अंतहीन इंतज़ार के आलावा कुछ भी शेष नहीं लगता है, मानो यही उसकी नियति है।

                सिनेमा से जुड़े तमाम सिद्धांतकार मानते हैं कि मणिकौल पर ब्रेसां, रेने और अंद्रेई तार्कोवस्की का प्रभाव था, कमोबेश यह सच भी है, परन्तु वास्तव में मणिकौल ने फिल्मांकन की अपनी शैली विकसित की है। उनकी फिल्मों के दृश्यों में परस्पर संबद्धता नहीं होती है, बल्कि वे फ्रैगमेंटेड होते हैं। उनमें संवादों का अभाव और अनियमितता होती है। फ़िल्म के छोटे-छोटे शाट्स को जोड़कर कहानी कहने की कोशिश की गयी होती है। ब्रेसां और अंद्रेई तार्कोवस्की के यहाँ भी इसी तरह संवादों और सूचनाओं की डिटेलिंग के अभाव में कहानी कहने की जद्दोज़हद पाई जाती है। मणिकौल ने अपनी फिल्मों में आंद्रे बाजां के सैद्धांतिक पहलुओं पर ध्यान देते हुए, ‘मिज़े इन सीन’ तकनीक अपनाकर थीम को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। इसी कारण उनकी फिल्म के दृश्यों में फ्रैगमैंटेशन तकनीक की बहुलता दिखाई देती है। मणिकौल अपने सिनेमाई-अनुप्रयोगों को चिंतन की एक प्रक्रिया मानते हुए स्वीकार करते हैं कि- “फ़िल्म बनाने का भी चिंतन करना चाहिए। इसके बारे में चिंतन चलना चाहिए। फ़िल्म देखने के तरीके को अगर बदलना चाहते हैं तो कुछ और करने की जरुरत है बजाय इसके कि एप्रीसीएशन इतना उबाऊ कर दो।” मणिकौल का यह स्वीकार्य व्यावसायिक सिनेमा पर एक गंभीर टिप्पणी है। मणिकौल की फिल्मों के आवांगर्द अनुप्रयोगों पर बहुत से सिने-सिद्धांतकारों को आपत्ति रही है, परन्तु इससे उनका महत्व कम नहीं हो जाता अपितु यह उनके और दर्शकों के सौंदर्य-बोध पर  प्रश्न खड़े करता है।

                ‘सारा आकाश’ एक निम्न मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार की रोज़मर्रा की विसंगतियों का पर्दे पर रचा गया एक जीवंत आख्यान है। फ़िल्म की पटकथा बासु चटर्जी, छायांकन के.के. महाजन और संगीत सलिल चौधरी का है। फ़िल्म की लम्बाई 100 मिनट और लोकेशन राजेंद्र यादव का आगरा का पुश्तैनी मकान है। बासु चटर्जी 18 साल की उम्र में ही बम्बई आ गए थे और अगले 19 सालों तक ‘ब्लिट्ज’ (साप्ताहिक) में बतौर कार्टूनिस्ट नौकरी करते रहे थे। ‘सारा आकाश’ के निर्देशन से पूर्व ‘सरस्वतीचंद्र’ (1966) में गोविन्द सरैया और ‘तीसरी कसम’ (1968) में बासु भट्टाचार्य के सहायक निर्देशक के रूप में काम कर चुके थे। बतौर निर्देशक बासु चटर्जी और बतौर सिनेमैटोग्राफर के.के. महाजन की ‘सारा आकाश’ पहली फ़िल्म है। महाजन को इस वर्ष (1969) की दो फिल्मों ‘सारा आकाश’ और ‘उसकी रोटी’ के लिए सर्वोत्तम चलचित्र कला (सिनेमैटोग्राफी) का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ था। ‘भुवनशोम’, ‘सारा आकाश’ और ‘उसकी रोटी’ का छायांकन महाजन ने ही किया था। महाजन फ़िल्म संस्थान से ‘मोशन पिक्चर फोटोग्राफी’ में स्नातक (1966) थे। उन्हें स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ था। बम्बई से  उन्होंने स्वतन्त्र सिनेमैटोग्राफर के रूप में शुरुआत की। आरंभ में उन्होंने विज्ञापन फिल्मों में काम किया। उन्होंने कई डाक्यूमेंट्री फिल्मों मसलन श्याम बेनेगल की ‘चाइल्ड ऑफ दि स्ट्रिप्स’ (1967), कुमार शाहनी की ‘ए सर्टेन चाइल्डहुड’ (1967), बी.डी. गर्ग की ‘अमृता शेरगिल’ (1968) और ‘महाबलीपुरम’ (1968) में काम किया। साथ ही उन्होंने कुमार शाहनी की फीचर फ़िल्म ‘द ग्लास पने’ (1966) में भी काम किया। उनकी प्रतिभा ने ही नये सिनेमा के फ़िल्मकारों का ध्यान आकर्षित किया। 

                ‘सारा आकाश’ बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित एक मात्र ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म थी। फ़िल्म की थीम निम्न मध्यवर्गीय परिवार के पति-पत्नी के साथ सामंजस्य ना बिठा पाने पर आधारित है। समर (राकेश पाण्डेय) अभी कॉलेज की पढाई पूरी भी नहीं कर पाया है कि उसके विरोध के बावजूद परिवार वाले उसका विवाह कर देते हैं। प्रभा (मधु चक्रवर्ती) बी.ए. तक पढ़ाई कर चुकी है। विवाह के बाद भी दोनों बातचीत नहीं कर पाते और संवादहीनता बढ़ती जाती है। समर दिवास्वप्न में जीता है। वह जीवन में जो करना चाहता है, जो होना चाहता है, वह कर नहीं पाता और इस सबके लिए, वह असमय हुए विवाह को दोष देता है। आर्थिक विसंगतियों के झंझावात में बेरोजगार युवावर्ग कमोबेश दिशाहीन हो चुका है। स्वातंत्रयोत्तर भारत में लगभग यह पूरे मध्यवर्ग की समस्या है जो कि विडम्बनापूर्ण जीवन को अभिशप्त बना देती है। बासु चटर्जी ने साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंधों को अपनी फिल्मों में एक नए आयाम के साथ विकसित किया, जो कि पूर्णतः शहरी मध्यवर्ग के पहचान की समस्या, आर्थिक व सामाजिक विसंगतियों से जुड़ी हुई थी।

                  बासु चटर्जी की फिल्मों पर ऋषिकेश मुखर्जी का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है, क्यूंकि उन्होंने भी फिल्मों के प्लाट के तौर पर शहरी मध्यवर्ग की जीवन शैली व स्पंदन का चुनाव किया। इससे पहले ऋषिकेश मुखर्जी ‘अनाड़ी’ (1959), ‘अनुराधा’ (1960), ‘अनुपमा’ (1966), ‘गबन’ (1966), ‘आशीर्वाद’ (1968) और ‘सत्यकाम’ (1969) जैसी सफल फ़िल्में बना चुके थे। बासु चटर्जी फिल्मों टेक्निकल रिचनेस के साथ-साथ साहित्यिक कथ्य के सिनेमाई  रूपांतरण को विशेष महत्व देते हैं। वैसे भी सिनेमा का अपना शिल्प अन्य कला-माध्यमों से भिन्न होता है, जरुरत इस बात की होती है कि साहित्यिक-उपादानों को उन कला-माध्यमों के साथ संयोजित किस प्रकार किया गया है और अंततः पर्दे पर उसका शिल्प कैसा बन पड़ा है। फ़िल्मकार छपे हुए टेक्स्ट को सिनेमाई-बिम्बों में प्रदर्शित करने में कहाँ तक सफल हुआ है। बासु चटर्जी की फ़िल्में और धारावाहिक सीरीज मसलन ‘रजनी’- जिसकी पटकथा प्रख्यात कथाकार मन्नू भंडारी ने लिखी (1985), ‘कक्का जी कहिन’- मनोहर श्याम जोशी के व्यंग ‘नेता जी कहिन’ पर आधारित (1988), और ‘व्योमकेश बख्शी’- बंगाली साहित्य में प्रसिद्ध डिटेक्टिव चरित्र शरदेंदु बंद्योपाध्याय पर आधारित (1993), को देखने से उनकी रेंज का पता चलता है। ‘सारा आकाश’ अभिनय, छायांकन, संगीत और ध्वनि की दृष्टियों से पहले की हिंदी फिल्मों से अलग पायदान पर अपनी महत्ता सिद्ध करती है। यह फ़िल्म पर्दे पर अभिव्यक्ति के विभिन्न उपादानों के साथ-साथ शब्द, ध्वनि, बिम्ब और शिल्प-विधान की दृष्टियों से एकमेक हो जाती है और अपनी अमिट उपस्थिति दर्ज कराती है।

                  दरअसल एक अच्छी फ़िल्म हमारे अंदर देखने का संस्कार पैदा करती है। सिनेमा के यथार्थ से हमारे अंदर जीवन के यथार्थ को एक नई दृष्टि से देखने का नजरिया विकसित होता है। यह दृष्टि किसी दर्शन से नहीं, अपितु फ़िल्म के उन छोटे-छोटे दृश्य-बंधों से उत्पन्न होती है। प्रत्येक दर्शक उसे एक नया अर्थ देता है। समानांतर सिनेमा के सन्दर्भ में सच कहें तो, ‘पाथेर पांचाली’ ने 1955 में ही एक नया मानदंड स्थापित कर दिया था कि भविष्य का सिनेमा कैसा होगा? समानांतर सिनेमा की इस परंपरा को सत्यजित राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, मणिकौल, बासु चटर्जी, अडूरगोपाल कृष्णन, कुमार शाहनी, गौतम घोष, अपर्णा सेन, एम.एस. सथ्यु, श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, सई परांजपे, केतन मेहता, जी. अरविंदन जैसे हस्ताक्षरों ने समृद्ध किया है। यह आंदोलन सामंती परिवेश की जड़ता को खत्म करने, स्त्री-अधिकारों की मुक्ति के प्रश्न और शोषितों-उत्पीड़ितों के सहज प्रतिरोध को उभारने में भारतीय समाज की मदद करता है। शायद इसी कारण से यह मूलतः साहित्य से अपने सृजनात्मक संबंधों के बिना पर एक अखिल भारतीय आंदोलन का स्वरूप अख्तियार कर पाया। 

                               

सन्दर्भ-
·         भारतीय कला का इतिहास- भगवतशरण उपाध्याय
·         साहित्य और संस्कृति- अमृत लाल नागर
·         सत्यजित राय का सिनेमा- चिदानंददास गुप्ता
·         हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र- जबरीमल्ल पारख
·         सिनेमा और संस्कृति- रही मासूम रजा
·         भारतीय सिनेमा का अंतःकरण- विनोददास
·         हिंदी सिनेमा का इतिहास- मनमोहन चड्ढा
·         सिनेमा नया सिनेमा- सुरेन्द्र नाथ तिवारी
·         सिनेमा नया सिनेमा- ब्रजेश्वर मदान
·         सिनेमा पढ़ने के तरीके- विष्णु खरे
·         What is Cinema- Andre Bazin (Volume-1)
·         Our Film Their Film- Satyajit Ray
·         The New Indian Cinema- Aruna Vasudev
·         How to Read a Film- James Monaco
·         Film and Fiction- Somdatta Mandal
पत्रिकाएं-
·         वर्तमान साहित्य- सदी का सिनेमा (संपादक- मृत्युंजय)
·         प्रगतिशील वसुधा- हिंदी सिनेमा बीसवीं सदी से इक्कीसवीं सदी तक (संपादक- प्रह्लाद अग्रवाल)
·         लमही (सिनेमा विशेषांक), संपादक- विजय राय
 
      

Friday, February 15, 2013

साहिर लुधियानवी साहब की नज़्म 'परछाइयाँ' काफी मौजूं रही है हमारे लिए... यूँ तो यह संग्रह १९६० में आया, लेकिन आज भी उतनी ही शिद्दत के साथ कहा और सुना जाता... यह नज़्म साहिर साहब की आवाज में सुनिए...


परछाइयाँ 


जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख्वाबे-मरमरीं की तरह
हसीन फूल, हसीं पत्तियाँ, हसीं शाखें
लचक रही हैं किसी जिस्मे-नाज़नीं की तरह
फ़िज़ा में घुल से गए हैं उफ़क के नर्म खुतूत
ज़मीं हसीन है, ख्वाबों की सरज़मीं की तरह
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरतीं हैं

कभी गुमान की सूरत कभी यकीं की तरह
वे पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
खामोश होठों से कुछ कहने-सुनने आए हैं
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते-जागते लमहे चुराके लाए हैं
यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था
यहीं से हमने मुहब्बत की इब्तिदा की थी
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुजूरे-ग़ैब में नन्हीं सी इल्तिजा की थी
कि आरज़ू के कंवल खिल के फूल हो जायें
दिलो-नज़र की दुआयें कबूल हो जायें
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बचकर
नज़र झुकाये हुए और बदन चुराए हुए
खुद अपने कदमों की आहट से, झेंपती, डरती,
खुद अपने साये की जुंबिश से खौफ खाए हुए
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

रवाँ है छोटी-सी कश्ती हवाओं के रुख पर
नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है
तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से
मेरी खुली हुई बाहों में झूल जाता है
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में
तुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती है
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ
ज़बान खुश्क है आवाज़ रुकती जाती है
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मेरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं
तुम्हारे होठों पे मेरे लबों के साये हैं
मुझे यकीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान है कि हम मिलके भी पराये हैं।
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मेरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को,
अदाए-अज्ज़ो-करम से उठ रही हो तुम
सुहाग-रात जो ढोलक पे गाये जाते हैं,
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

वे लमहे कितने दिलकश थे वे घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं,
वे सहरे कितने नाज़ुक थे वे लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं

बस्ती को हर-एक शादाब गली, रुवाबों का जज़ीरा थी गोया
हर मौजे-नफ़स, हर मौजे सबा, नग़्मों का ज़खीरा थी गोया

नागाह लहकते खेतों से टापों की सदायें आने लगीं
बारूद की बोझल बू लेकर पच्छम से हवायें आने लगीं

तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया

मग़रिब के मुहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ खाकी वर्दी-पोश आये
इठलाते हुए मग़रूर आये, लहराते हुए मदहोश आये

खामोश ज़मीं के सीने में, खैमों की तनाबें गड़ने लगीं
मक्खन-सी मुलायम राहों पर बूटों की खराशें पड़ने लगीं

फौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईं
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईं

इनसान की कीमत गिरने लगी, अजनास के भाओ चढ़ने लगे
चौपाल की रौनक घटने लगी, भरती के दफ़ातर बढ़ने लगे

बस्ती के सजीले शोख जवाँ, बन-बन के सिपाही जाने लगे
जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे

इन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई, बरनाई भी
माओं के जवां बेटे भी गये बहनों के चहेते भाई भी

बस्ती पे उदासी छाने लगी, मेलों की बहारें ख़त्म हुई
आमों की लचकती शाखों से झूलों की कतारें ख़त्म हुई

धूल उड़ने लगी बाज़ारों में, भूख उगने लगी खलियानों में
हर चीज़ दुकानों से उठकर, रूपोश हुई तहखानों में

बदहाल घरों की बदहाली, बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़कर काल बनी, सारी बस्ती कंगाल बनी

चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं, पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं
कितनी ही कंवारी अबलायें, माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं

इफ़लास-ज़दा दहकानों के हल-बैल बिके, खलियान बिके
जीने की तमन्ना के हाथों, जीने ही के सब सामान बिके

कुछ भी न रहा जब बिकने को जिस्मों की तिजारत होने लगी
ख़लवत में भी जो ममनूअ थी वह जलवत में जसारत होने लगी
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

तुम आ रही हो सरे-आम बाल बिखराये हुये
हज़ार गोना मलामत का बार उठाये हुए
हवस-परस्त निगाहों की चीरा-दस्ती से
बदन की झेंपती उरियानियाँ छिपाए हुए
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मैं शहर जाके हर इक दर में झाँक आया हूँ
किसी जगह मेरी मेहनत का मोल मिल न सका
सितमगरों के सियासी क़मारखाने में
अलम-नसीब फ़िरासत का मोल मिल न सका
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

तुम्हारे घर में क़यामत का शोर बर्पा है
महाज़े-जंग से हरकारा तार लाया है
कि जिसका ज़िक्र तुम्हें ज़िन्दगी से प्यारा था
वह भाई 'नर्ग़ा-ए-दुश्मन' में काम आया है
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

हर एक गाम पे बदनामियों का जमघट है
हर एक मोड़ पे रुसवाइयों के मेले हैं
न दोस्ती, न तकल्लुफ, न दिलबरी, न ख़ुलूस
किसी का कोई नहीं आज सब अकेले हैं
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

वह रहगुज़र जो मेरे दिल की तरह सूनी है
न जाने तुमको कहाँ ले के जाने वाली है
तुम्हें खरीद रहे हैं ज़मीर के कातिल
उफ़क पे खूने-तमन्नाए-दिल की लाली है
  तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे

उस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनियाँ में
सहमी हुई दोशीज़ाओं की मुसकान भी बेची जाती है

उस शाम मुझे मालूम हुआ, इस कारगहे-ज़रदारी में
दो भोली-भाली रूहों की पहचान भी बेची जाती है

उस शाम मुझे मालूम हुआ जब बाप की खेती छिन जाये
ममता के सुनहरे ख्वाबों की अनमोल निशानी बिकती है

उस शाम मुझे मालूम हुआ, जब भाई जंग में काम आये
सरमाए के कहबाख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है

सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे

तुम आज ह्ज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तनहाई में
या बज़्मे-तरब आराई में
मेरे सपने बुनती होगी बैठी आग़ोश पराई में।

और मैं सीने में ग़म लेकर दिन-रात मशक्कत करता हूँ,
जीने की खातिर मरता हूँ,
अपने फ़न को रुसवा करके अग़ियार का दामन भरता हूँ।

मजबूर हूँ मैं, मजबूर हो तुम, मजबूर यह दुनिया सारी है,
तन का दुख मन पर भारी है,
इस दौरे में जीने की कीमत या दारो-रसन या ख्वारी है।

मैं दारो-रसन तक जा न सका, तुम जहद की हद तक आ न सकीं
चाहा तो मगर अपना न सकीं
हम तुम दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िले-तस्कीं पा न सकीं।

जीने को जिये जाते हैं मगर, साँसों में चितायें जलती हैं,

खामोश वफ़ायें जलती हैं,
संगीन हक़ायक़-ज़ारों में, ख्वाबों की रिदाएँ जलती हैं।

और आज इन पेड़ों के नीचे फिर दो साये लहराये हैं,
फिर दो दिल मिलने आए हैं,
फिर मौत की आंधी उट्ठी है, फिर जंग के बादल छाये हैं,

मैं सोच रहा हूँ इनका भी अपनी ही तरह अंजाम न हो,
इनका भी जुनू बदनाम न हो,
इनके भी मुकद्दर में लिखी इक खून में लिथड़ी शाम न हो॥

सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वह शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे॥

हमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सका,
मगर इन्हें तो मुरादों की रात मिल जाये।

हमें तो कश्मकशे-मर्गे-बेअमा ही मिली,
इन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाये॥

बहुत दिनों से है यह मश्ग़ला सियासत का,
कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जायें।

बहुत दिनों से है यह ख़ब्त हुक्मरानों का,
कि दूर-दूर के मुल्कों में क़हत बो जायें॥

बहुत दिनों से जवानी के ख्वाब वीराँ हैं,
बहुत दिनों से मुहब्बत पनाह ढूँढती है।

बहुत दिनों में सितम-दीद शाहराहों में,
निगारे-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढ़ती है॥

चलो कि आज सभी पायमाल रूहों से,
कहें कि अपने हर-इक ज़ख्म को जवाँ कर लें।

हमारा राज़, हमारा नहीं सभी का है,
चलो कि सारे ज़माने को राज़दाँ कर लें॥

चलो कि चल के सियासी मुकामिरों से कहें,
कि हम को जंगो-जदल के चलन से नफ़रत है।

जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आये,
हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है॥

कहो कि अब कोई कातिल अगर इधर आया,
तो हर कदम पे ज़मीं तंग होती जायेगी।

हर एक मौजे हवा रुख बदल के झपटेगी,
हर एक शाख रगे-संग होती जायेगी॥

उठो कि आज हर इक जंगजू से कह दें,
कि हमको काम की खातिर कलों की हाजत है।

हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,
हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है॥

कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख न करे,
अब इस जा कोई कंवारी न बेची जाएगी।

ये खेत जाग पड़े, उठ खड़ी हुई फ़सलें,
अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जायेगी॥

यह सर ज़मीन है गौतम की और नानक की,
इस अर्ज़े-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी।

हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,
हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥

कहो कि आज भी हम सब अगर खामोश रहे,
तो इस दमकते हुए खाकदाँ की खैर नहीं।

जुनूँ की ढाली हुई ऐटमी बलाओं से,
ज़मीं की खैर नहीं आसमाँ की खैर नहीं॥

गुज़श्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये तनहाइयाँ भी जल जायें।

गुज़श्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार,
अजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जायें॥

Wednesday, November 9, 2011

सारी चीजें फ्लेक्सिबिल नहीं होतीं...



विगत 20 मार्च 2009 को काफी गहमा-गहमी में 'फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पूना' द्वारा आयोजित सेमिनार 'साहित्य के सिनेमाई रूपांतरण से जुड़े प्रश्न' में नागपुर से पहुंचा. वहां एक तरफ मणिकौल, गोविन्द निहलानी, गुलज़ार और जावेद अख्तर जैसी पुरानी पीढ़ी के लोग मौजूद थे तो दूसरी तरफ अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज और कमलेश पाण्डेय जैसी नयी पीढ़ी भी शिरकत कर रही थी. बहरहाल हमें अनुराग से 'देव डी' (2009) पर बात करनी थी और उन्होंने विस्तार से बातचीत के लिए मुंबई बुलाया. अगले दिन उनके घर वर्सोवा (अँधेरी ईस्ट) पहुंचा. यह साक्षात्कार 'देवदास' (उपन्यास) के सिनेमाई रूपांतरण को केंद्र में रखकर लिया गया है...... 
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Wednesday, October 19, 2011

जे.एन.यू. की एक शाम मनोज वाजपेयी के साथ....


किसी फिल्म (शूल) का मुख्य किरदार (मनोज वाजपेयी) आपसे कहे कि फला किरदार (समर प्रताप सिंह) को निभाते समय अवसाद के कारण मुझे मनोचिकित्सक के पास जाना पड़ा, तो आप कैसा महसूस करेंगे? सबसे पहले हमारा ध्यान उस किरदार की तरफ जायेगा और फिल्म के संवाद हमारे जेहन में कौंधने लगते हैं. ज़हनी तौर पर मैं 'शूल' के एक संवाद की याद दिलाना चाहूँगा कि कैसे एक व्यक्ति के अन्दर व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध पनपता है और वह अपनी ज़िन्दगी तिल-तिल जीने के लिए मजबूर हो जाता है.

मंज़री (रवीना टंडन)- 'इतनी ही भड़ास निकालनी थी तो जान से क्यूँ नहीं मार देते बच्चू यादव को'
समर प्रताप सिंह (मनोज वाजपेयी)- 'क्यूंकि डरते हैं हम ,
        आज  ज़िन्दगी में पहली बार डर लगा है हमें 
        हम जाके गोली मार देंगे चढ़ जायेंगे फांसी 
       हमको मरने से डर नहीं लगता है,लेकिन डरते हैं आपके लिए 
       साला गधा थे जो पुलिस में आये और आके शादी कर ली 
      अगर आप हमारी ज़िन्दगी में नहीं होतीं  न मंज़री जी तो वो साला भडवा बच्चू यादव 
      आज 10 फूट ज़मीन के नीचे गड़ा होता'

'शूल' में मनोज वाजपेयी के अभिनय से भला कौन दर्शक मुतास्सिर नहीं हुआ होगा और किसके मस्तिष्क में शूल की चुभन नहीं पैठी होगी. चार्ली चैप्लिन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वे पहले नाटकों में काम करते थे और काम के दौरान उनके किरदारों की छाप वास्तविक जीवन को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करती थी, जिसे नहीं करती वह कलाकार नहीं है. 

               बीती शाम जे.एन.यू. में मनोज वाजपेयी इन्ही शब्दों के साथ हमसे रूबरू हो रहे थे. बिहार और उत्तर प्रदेश की यूथ अपने हीरो से मिलने के लिए बेताब नज़र आ रही थी और उन्हें बतौर हिंदी सिनेमा के चरित्र अभिनेता नहीं बल्कि बिहारी हीरो के रूप में ज्यादा तवज्जो दी जा रही थी. मज़े की बात यह कि मनोज वाजपेयी को जे.एन.यू. से कुछ इस कदर जोड़ा जा रहा था कि इनके भाई ने यहीं से पढ़ाई की और उन दिनों मनोज उनसे मिलने आया करते थे. गंगा ढाबा व गोदावरी ढाबा पर बैठकें हुआ करती थीं. पुराने दिनों की यादें ताज़ा करते हुए मनोज वाजपेयी ने बताया की खालीपन के दिनों में वे सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले अपने दोस्तों के साथ मुखर्जी नगर में रहते थे और यहीं से थियेटर की शुरुवात की. मनोज वाजपेयी और शाहरुख़ ने साथ- साथ बैरी जोंस का स्कूल ज्वाइन किया. लेकिन बैरी जोंस के स्कूल से निकलकर शाहरूख जहाँ न्यू इकनामिक पालिसी के बाद के भारत में एलिट क्लास और इंडियन यूथ का आइकॉन बन गया. ग्लोबलाइज्ड मार्केट में शाहरूख, कोक और सेक्स बिकने लगा. इसके बरक्स मनोज बाजपेयी की छवि रफ, बेसिक अनुभूतियों वाले कलाकार व हार्डकोर एक्टर की रही है न कि खांटी इंटरटेनर की.

                                         कहानी और कंटेंट पर बातचीत करते हुए मनोज वाजपेयी ने बताया कि वे स्क्रिप्ट पर सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं. स्क्रिप्ट के आधार पर ही वे फिल्मों का चुनाव करते हैं. अपनी पहली फिल्म (बैंडिट क्वीन, 1994) करते हुए एक नए अनुभव से गुजरना उन्हें बहत ही दिलचस्प लगता है. शूटिंग के दौरान शेखर कपूर उनसे कहते हैं कि 'तुम जो करना चाहते हो वह करो, और यह भूल जाओ कि स्क्रीन पर कैसे दिखोगे'. हिंदी सिनेमा की मार्केट पालिसी के बारे में बात होने पर वे मानते हैं कि हमें प्रोडूसर का भी ध्यान रखना होगा, जिसने फिल्म पर पैसे लगाये हैं और फिल्म वितरकों के जेहन का भी ख्याल रखना होगा, जो हमारी फिल्म को उत्पाद बनाकर मार्केट में उतारेगा. इन सारी बातों में सामंजस्य बिठाकर ही हम आज के सिनेमा को खाद-पानी दे सकते हैं. भोजपुरी सिनेमा के प्रश्न पर मनोज ने अपनी चिंता जताई कि आज ऐसी फ़िल्में कंटेंट और स्पेस के स्तर पर दिवालियेपन कि स्थिति में हैं. भोजपुरी फिल्मों में बेहतरीन स्क्रिप्ट का अभाव है, इसलिए बतौर अभिनेता वे ऐसी फिल्मों से दूर हैं.

                                         हिंदी सिनेमा में कमोबेश बिहार की गरीबी और राजनीति को प्रोजेक्ट किया जाता है, जबकि ऐसा केवल इसलिए होता है कि एक फ़िल्मकार इस प्रदेश की संवेदनशीलता को भुनाकर पैसे बनाने को केंद्र में रखता है, जे.एन.यू. की यूथ के ऐसे सवालों से भी मनोज वाजपेयी को इत्तेफाक रखना पड़ा. बिहार एक पोलेटिक्ली साउंड स्टेट है, क्या आप भविष्य में राजनीति में कदम रख सकते हैं, इस पर मनोज वाजपेयी का मानना था कि भविष्य में क्या होगा यह हम नहीं जानते, लेकिन अभी तो फ़िलहाल कोई इरादा नहीं है राजनीति में जाने का. जे.एन.यू. की उत्तर भारतीय जनता से ऐसे प्रश्न भी सुनने को मिले कि 'क्या मैं आपकी तरह हीरो बन सकता हूँ?' 





बकौल मनोज वाजपेयी असल ज़िंदगी में वे भी एक आम इंसान की तरह हैं, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक तीनों ही स्तर पर सभी किस्म के संघर्ष के बीच एक अभिनेता के स्तर पर वे खुद को अनगिनत किरदारों के लिए तैयार करते हैं. समानांतर सिनेमा आन्दोलन के बीते दौर के साथ हमें यह मानने से कतई इंकार नहीं करना चाहिए कि मनोज वाजपेयी वर्तमान समय के अलहदा कलावादी सिनेमा के सशक्त हस्ताक्षर हैं, जिनमें अपने समय की पीड़ा भी है और अपने समय के सच को उजागर करने की असीम संभावनाएं भी. बहरहाल जगजीत सिंह के चंद हर्फों 'कोई दोस्त है न रक़ीब है तेरा शहर कितना अजीब है' के साथ मनोज वाजपेयी की आने वाली फिल्म 'चिटगांव' के इंतजार में.......



Monday, December 6, 2010

पाठक पढ़ें और बताएं कि क्या मैं उन्हें समझ सकी : चित्रा मुद्गल

जमाना बदल रहा है और इसके साथ बदल रहा है हमारा समाज। बदल रही हैं समाज की पुरानी रूढिवादी
विचारधारा और बदल रहे हैं हम। बदल रहा है हमारे जीने का अंदाज और इसके साथ ही धीरे-धीरे एक नए
समाज की परिकल्‍पना साकार रूप ले रही है। इस नए समाज में कोई भेदभाव नहीं है, कोई दुराव नहीं है,
स्‍त्री और पुरूष के बीच कोई अंतर नहीं है। यह सत्‍य है क्‍योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो महिलाएं आज
जीवन के हर क्षेत्र में पुरूषों से कदमताल मिलाकर चल नहीं रही होती। यदि यह सच नहीं होता तो
एक बच्‍ची, जिसका बचपन समाज की पुरातनपंथी विचारधाराओं से आंतरिक संघर्ष के कारण कुंठित
होकर रह गया, आज हमारे सामने एक समाज सेविका ओर साहित्‍यकार के रूप में मोजूद नहीं होती।
जी हां, हम बात कर रहे हें हिंदी साहित्‍य की जानी-मानी हस्‍ती चित्रा मुद्गल की। व्‍यास सम्‍मान पाने
वाली पहली महिला साहित्‍यकार चित्रा से खास बात की कलिका जैन ने।

-लेखक को हिंदी साहित्य की दुनिया में आप कहाँ देखती हैं?
मुझे लगता है कि लेखक जब भी लिखना शुरू करता है या उसे यह छटपटाहट होती है कि वो लिखे
बिना नहीं रह सकता तो उसकी मुठभेड़ समाज से, व्यवस्था से, अंधविश्वासों से, रुढियों से होती है
और इसमें उसका हथियार होता है उसकी लेखनी। मेरे मन में ये बात कभी नहीं आई कि साहित्य कि
दुनिया में मैं यानि लेखक यानि की मेरी कलम की क्या हैसियत होगी. उस दुनिया में मेरे लेखन को
कैसे लिया जाएगा. मैंने सिर्फ इतना सोचा कि अपने असंतोष को मैं कैसे व्यक्त कर सकती हूँ. वह
असंतोष जो कहीं न कहीं एक स्त्री या लड़की होने के नाते होता है, अपने घर और गली से ही शुरू होता
है वो एहसास की एक लड़की को समाज में किस तरह से लिया जाये...

-आमतौर पर आपके लेखन में भी इसके खिलाफ आवाज़ देखने को मिलती है...
यह सही है क्यूंकि मैं विद्यार्थी जीवन से ही कुछ ऐसे लोगों के प्रभाव में आई जिन्‍होंने मेरे जीने का,
सोचने-समझने का नजरिया ही बदल डाला. और जहां तक मुझे लगता है कि यह मेरे लिए अच्‍छा ही
हुआ। मैंने उन्‍हीं से यह सीखा कि एक विधार्थी को अपने करियर में सफलता हासिल करने के लिए
केवल पाठ्यपुस्‍तकां तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। उसे अपने गली-मोहल्लों, अपने चारों ओर के
वातावरण के साथ लगातार कुछ नया करने की, सीखने की कोशिश करती रहनी चाहिए। लेकिन
समस्‍या यह है कि इस उम्र में लोग अक्‍सर इस सत्‍य को समझ नहीं पाते हैं।  मुझे लगता है कि
वही वो वक़्त था जिसने मुझे ऐसे लोगों के समीप किया जिन लोगों के मन में ये आग थी कि वो
दुनिया को बदलना चाहते हैं.

-क्या व्यक्तिगत तौर पर आप राजनीति में सक्रिय रूप से आने की इच्छा रखती हैं?
मेरी ऐसी इच्छा शुरू से ही नहीं रही. जिस वक़्त मैं मुंबई की झोपड़पट्टियों के लिए काम कर रही
थी तो मेरा एक लम्बा अनुभव हो रहा था. मुझे लगन से काम करता देख हमारे उत्तर भारतियों
के नेता हुआ करते थे राम मनोहर त्रिपाठी, उन्होंने कहा कि इस बार हम चित्रा को विधानसभा चुनाव
के लिए खड़ा करेंगे. और मेरा विश्वास है कि वो ज़रूर जीत जाएंगी. लेकिन मुझे मना किया मृणाल
गोरे ने. वो कहने लगीं कि देखो चित्रा तुमने अभी कुछ नहीं देखा है. तुमने जो कुछ देखा है वह तो
केवल एक बानगी भर है। अभी से ही अगर तुम इस राजनीति के प्रलोभन में पड़ गयी और तुम्हें
लगा कि तुममें बोलने की और लोगों के लिए लड़ने की ताकत है तो तुम बहुत कुछ नहीं देख  पाओगी.
मेरे उन बुजुर्गों ने मुझे समाज के लिए चेताया और समझाया की तुम ५ % की आवाज़ बनना चाहती
हो या पूरे देश की महिलाओं की...

-आप एक लेखिका होने साथ ही एक समाज सेविका भी हैं. तो क्या यही वजह है की नारी 
के उत्पीडन की आवाज़ आपके लेखन में आपकी आवाज़ बन जाती है?
शुरू में मैं केवल स्त्रियों के लिए काम नहीं कर रही थी. ट्रेड यूनियन में मजदूर स्रियाँ भी उनका हिस्सा
थीं. उनकी बहुत सी समस्‍याएं थीं. मैंने "आवां" में उन सब की बात रखी है. उनको उतने ही घंटे
काम करने के लिए वो पारिश्रमिक नहीं मिलता था जो पुरुषों को मिलता था. यह मानकर चला जाता
था कि औरतें कमज़ोर हैं और पुरुषों के मुकाबले उनके काम करने की क्षमता कम होती है। उन्हें 'पैकिंग गर्ल्स'
के रूप में रखना चाहिए. लेकिन ये बात हमारे नेता दत्ता सामंत जी ने समझाई  कि महिलाएं भी पुरूषों
की तरह लगातार 9 घंटे काम करती हैं, इससे पहले भी वो अपने घर का कामकाज निपटा  कर आती हैं.
मतलब ये कि वो दोहरा श्रम करती हैं और इसलिए उन्‍हें पुरूषों के बराबर पारिश्रमिक मिलनी ही चाहिए।
इसका ज़िक्र मैंने "आवां" में किया.

-क्या लड़की होने के कारण आपको अपने बचपन में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा ?
हाँ बिलकुल, मैं ज़मींदार परिवार के घर की पोती थी. जब मैंने कहा कि मुझे नृत्य सीखना है तो मेरी
दादी ने कहा की "पतुरिया बने खे का? रंडी हमलोग नचाते हैं, हमारे खानदान की लड़कियां नाचती नहीं
और तुम नाच सिखियो? हमारी नाक कट जाएगी...." मैंने कहा, मैं अपनी पॉकेट मनी से बचा कर
सीखूंगी तो उन्होंने कहा कि तुम्‍हें पॉकेट मनी नाच सीखने के लिए नहीं दिया जाता। मैंने कहा मैं ट्यूशन कर
लूंगी, तो उन्होंने कहा की जो पढने में खुद इतना साधारण हो उससे ट्यूशन कौन लेगा? मैंने कहा कि नहीं
हिंदी पढने के लिए कुछ लोग टीचर रखते हैं. और तबसे ही मैंने तय कर लिया की पॉकेट मनी नहीं लूंगी।
मुझे लगा कि अगर पॉकेट मनी देकर मेरी आत्मा, चेतना और ख्वाहिशों को कुचला जाएगा तो फिर न लेना
ही बेहतर है...

तो हमारे यहाँ मुख्य देहरी से आप दाखिल नहीं हो सकते थे. बैक साइड से स्त्रियाँ घुसती थीं और बाहर आती
थीं. ये सब देख के मुझे लगा कि मैं जब कभी शादी करुँगी तो ऐसे गाँव में नहीं करुँगी, ऐसी जात में नहीं
करुँगी जहाँ औरत को ससुराल आकर इतना लम्बा घूँघट निकालना पड़ता है. जब मैंने घर में शादी की
खबर दी तो मुद्गल जी मिलने के लिए मेरे घर पर आये. मेरे पिताजी ने उनसे कहा की तुम जानते हो
जो तनख्वाह तुम ४०० रूपए पाते हो वो हमारे यहाँ ड्राईवर को दी जाती है. यह लड़की जिन सुविधाओं में
जी रही है इसका बुखार उतर जाएगा. इधर इसे बुखार चढा है  समाज सेवा का, अपने होने को जीने का और
ठाकुर खानदान में ब्याह न करने का. लेकिन मैंने तय कर लिया था की मैं ये गाय-बैलों वाली ज़िन्दगी नहीं
जी सकती. खैर, जब मेरा बेटा पैदा हुआ राजीव तो अस्पताल में मेरे पिताजी भी आये. मुझसे नहीं बोले,
उनकी नाराज़गी बरकरार थी. उन्होंने नर्सों को चांदी के सिक्के दिए बच्चे को प्यार करके चले गए. तो इन
सारी बातों से कहीं न कहीं दुःख होता है, किसी भी लड़की को अपना घर छोड़ते हुए कभी ख़ुशी नहीं होती।

-क्या आप मानती हैं हिंदी साहित्य की मौजूदा स्थिति अब मुरझाई हुई सी हो गयी है या अंग्रेजी के 
पीछे भागना इसकी एक वजह है?
मुझे नहीं लगता कि मुरझाई हुई स्थिति है बल्कि मेरे माधुरी के दिनों की मित्र शोभा किलाचंद थीं जो अब
शोभा डे हैं, उनकी तरह का लेखन हमारे यहाँ गुलशन नंदा और शिवानी जी करते रहे हैं तो लोग उनको लेखक
नहीं मानते. कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और उषा प्रियम्वदा के बीच शिवानी जी कहीं नहीं रहतीं. हाँ,
जो लोग ये सोचते हैं कि अंग्रेजी में लिख कर वो हिन्दुस्तानी लेखक कम, रातों रात अंतरराष्ट्रीय लेखक हो जाएँगे
तो ये उनकी गलतफहमी है. एक अरुंधती रॉय हो गयी हैं तो ये अलग बात है. लेकिन हमारी अन्य लेखिकाएं
या लेखक, मैं नाम नहीं लेना चाहूंगी वो कहीं नहीं पहुंचे... अंग्रेजी में लिखने वाला व्यक्ति कहीं न कहीं एक
तरह की सुपिरिओरिटी कॉम्प्लेक्स में जीता है. लेकिन उनको इतने पाठक नहीं मिलते. वहां भी देखेंगे कि कई
अंग्रेजी के बहुत बड़े बड़े प्रकाशक रोते हुए मिलेंगे कि जी इनको तो साहित्य अकेडमी अवार्ड मिल गया है,
लेकिन इनकी किताब कोई विशेष नहीं बिक रही है. हिन्दुस्तान में ही बिक रही है. जो विदेशों में झुम्पा लाहिरी
वगेरह हैं, उनका भी बेस्ट सेलर रूप एक आध पुस्तकों को लेकर है.

-आजकल आप किन कामों में लेखनी चला रही हैं?
मैंने बच्चों की चार किताबें लिखी हैं. मैं ये मानती हूँ कि बच्चों के लिए लिखना बहुत ज़रूरी है केवल आग्रह
पर लिखना ज़रूरी नहीं है. जो बच्चा पैदा हम करते हैं उसको हमें सिखाना होगा ताकि लड़के लड़की के भेद
को मिटाया जाये. और लिखना भी होगा ताकि बच्चे इन चीज़ों को पढ़ के सीखें की अपने घर में अपनी बहनों
के साथ उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए.

-चित्रा जी हमसे बात करने के लिए धन्यवाद.
मैं ज़रूर चाहूंगी कि मुझे पढ़ने वाले मेरी किताबों को पढें और मुझे बताएं कि मैं क्या लिख पाती हूँ, क्या
मैं उनके मन का, उनके संघर्ष का, उनके उत्पीडन का, जीवन और शोषण का कोई भी एक क्षण पकड़ पाती हूँ
क्या? वो मुझे पढेंगे तो मुझे ख़ुशी होगी...
 sabhar-Hindi Lok

Saturday, November 20, 2010

क्यों पढ़ना चाहिए आज भी प्रेमचंद को?
 

 
 
प्रेमचंद
उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं पर ज़बरदस्त पकड़ थी प्रेमचंद की
साहित्य या रचनाकृति जो है वह तो मूल रुप से कलाकृति होती है और वह सौंदर्य की चीज़ होती है.
सौंदर्य के बारे में कीट्स ने कहा है कि ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज़ ज्वाय फॉर एवर. तो जब हम प्रेमचंद या किसी और बड़े कलाकार के बारे में बात करते हैं जो वह यह मानना चाहिए कि सौंदर्य की कृति है.
सौंदर्य एक ऐसी चीज़ है जिसे लोग देखना चाहते हैं, उसका स्वाद लेना चाहते हैं. जो साहित्य है वह शब्दबद्ध सौंदर्य है और वह बूढ़ी नहीं हो सकती.
जो कालजयी साहित्य होता है वह समय के साथ-साथ और निखरता जाता है. जैसा कि सौंदर्य के बारे में कहा गया है कि जो समय के साथ निखरता जाता है वह सौंदर्य होता है.
साहित्यकार एक सौंदर्य की सृष्टि करते हैं और प्रेमचंद जितने बड़े रचनाकार हैं उतने बड़े सौंदर्य के निर्माता हैं इसलिए साहित्य बार-बार पढ़ा जाता है, जिसे हमे क्लासिकल साहित्य कहते हैं.
तो अगर नई पीढ़ी को सौंदर्य के प्रति उत्सुकता है, यदि उसमें क्षमता बची हुई है कि वह सौंदर्य का आस्वादन कर सके तो वे प्रेमचंद को पढ़ेंगे.
इतिहास बिद्ध
दूसरी बात यह कि जो बड़ा साहित्य होता है वह इतिहास बिद्ध होता है और इसका मतलब यह है कि अपने समय के इतिहास से जूझता है.
 साहित्य चीज़ों को जानने का भी बहुत बड़ा स्रोत है. इतिहासकार और अर्थशास्त्री जिन चीज़ों को छोड़ देते हैं, या छूट जाता है, जिस पर प्रकाश नहीं डाल सकते, साहित्यकार उस पर प्रकाश डालता है
 

साहित्य अपने समय के कितनों ही मुद्दों से, सूत्रों से, परिदृश्यों से जूझता है. आज की पीढ़ी उन सारे मुद्दों से हिंदुस्तान में जूझ रही है जो मुद्दे या सूत्र प्रेमचंद ने उठाए जैसे दहेज, अशिक्षा, वर्णाश्रम व्यवस्था, दलित आंदोलन, दलित चेतना, नारी चेतना है और सबसे बड़ी बात किसान की समस्या है.
प्रेमचंद किसान समस्या के सबसे बड़े रचनाकार हैं. अब रंगभूमि में सूरदास है, जिसकी छोटी सी ज़मीन है जिसपर मिल मालिक है जानसेवक आ कर के उस ज़मीन को हथियाना चाहता है, सूरदास उसे ज़मीन नहीं देते हैं. पूरे रंगभूमि में उसका संघर्ष दिखाई पड़ता है. गोदान में होरी छोटा किसान है. उसके ऊपर, चाहे वह कर्मकांड का हो, वर्णाश्रम व्यवस्था, सामंतवाद का हो, हर प्रकार के दबाव से उसकी ज़मीन छीन ली जाती है, और उसका लड़का नौकर बन जाता है.
इतिहास की यह प्रक्रिया उस समय से चल रही है कि छोटे किसान की ज़मीन उसके हाथ से निकल रही और वह मज़दूर बनने पर विवश है, यह एक इतिहास की प्रक्रिया है, यथार्थ का प्रवाह है. जिसे प्रेमचंद अपने उपन्यासों, कथाकृति में प्रकट करते हैं.
हमें यह याद रखना चाहिए कि साहित्य चीज़ों को जानने का भी बहुत बड़ा स्रोत है. इतिहासकार और अर्थशास्त्री जिन चीज़ों को छोड़ देते हैं, या छूट जाता है, जिस पर प्रकाश नहीं डाल सकते, साहित्यकार उस पर प्रकाश डालता है. मूल रूप से साहित्य एक जनतांत्रिक अनुशासन ही है.
स्वाधीनता आंदोलन ने जिन संपूर्ण रचनाकारों को जन्म दिया है उनमें से प्रेमचंद निश्चित रूप से महान रचनाकार हैं इसलिए हम बार-बार उनको पढ़ते हैं.
और इसीलिए उसे आज भी पढ़ा जाना चाहिए.
ये ठीक है कि प्रेमचंद के सामने जो समस्या थी वह आज उस रूप में नहीं है. प्रेमचंद ने किसान का जीवंत चित्रण किया है. आज के किसान आत्महत्या कर रहे हैं. किसानी दिमाग में पूंजीवाद आ रहा है. वह जल्दी बड़ा बनना चाहता है, जब वह नहीं होता है तो निराश होकर किसान आत्महत्या करता है. आज के रचनाकार को इसका वरण करना पड़ेगा.
 

Saturday, October 30, 2010

कई साल से कहाँ गुम हूँ

कई साल से कहाँ गुम हूँ
खबर नहीं 
नींद में ढूंढता है बिस्तर मेरा 
हर घड़ी खुद से उलझना 
है मुकद्दर मेरा 
मै ही कश्ती हूँ 
मुझी में है समंदर मेरा.............  

Friday, October 29, 2010

खामोश जिंदगी के कुछ नए अफसाने

अपने बारे में क्या कहूँ, जिंदगी की इस भीड़ भरे जंगल में एक बेसाख्ता तन्हा इंसान, जिसने हमेशा अजनबियों में अपनेपन की तलाश में खुद को खो दिया है| जिंदगी को बहुत नजदीक से देखते हुए भी उसकी खुमारियों से दूर हूँ| साहित्य में गहरी रूचि होने पर, इसने किरोड़ीमल कॉलेज से एम.ए. करा दिया और फिल्मों से इन्तहाई मुहब्बत होने के कारण एम.फिल. करने पर मजबूर कर दिया| बहरहाल अब साहित्य और सिनेमा के बुनियादी अन्तेर्सम्बंधों पर जे.एन.यु. से पी.एचडी कर रहा हूँ| बचपन से ही अपने अन्दर फिल्मों के प्रति गंभीर रचावट और बसावट लगातार महसूस करते हुए, सभी तरह की फ़िल्में स्कूल छोड़कर देखता था| इससे सबसे ज्यादा तकलीफ मेरी माँ को होती थी, उसे लगता था कि उसका इकलौता बेटा बर्बादी के कगार पर पहुँच चुका है| लेकिन पिछले कुछ सालों से मेरी माँ का विश्वास मेरे प्रति लौट रहा है| माँ के इस लौटते विश्वास का कारण आज तक नहीं समझ पाया क्योंकि जीवन के छब्बीसवें वसंत में आज भी फाकेमस्ती बरक़रार है| फिर कहीं यह भावनात्मक (छलावा वश) लगाव तो नहीं..............                     

सिनेमा में स्क्रिप्ट सबसे अहम चीज़ है मेरे लिए

किसी फिल्म (शूल) का मुख्य किरदार (मनोज वाजपेयी) आपसे कहे कि फला किरदार (समर प्रताप सिंह) को निभाते समय अवसाद के कारण मुझे मनोचिकित्सक के प...